Home बिहार पटना पहले घर आने की थी बेताबी, अब रोक‍ रही रोजगार की उम्‍मीद …ट्रेनों में कोरोना का भी डर

पहले घर आने की थी बेताबी, अब रोक‍ रही रोजगार की उम्‍मीद …ट्रेनों में कोरोना का भी डर

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पटना। लॉकडाइन में बिहार, यूपी और झारखंड के लाखों लोग दिल्ली-पंजाब-गुजरात और मुंबई जैसे शहरों में फंसे हैं। वे नहीं आ पा रहे। उन्हेंं लाया जाए, इसका हल्ला मचा था, लेकिन वापसी के लिए जब ट्रेनें चलने लगीं तो लाखों के लौटने का अनुमान हजारों की संख्या में सिमटता दिख रहा है। अब उन्‍हें स्‍पेशल ट्रेनों में कोरोना संक्रमण का भय भी सता रहा है। नियोक्‍ता भी जल्‍द काम शुरू होने की आशा में उन्‍हें रोक रहे हैं। ऐसा तबका भी है, जिसपर लॉकडाउन का आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ा है। ऐसे लोग भी बिहार आने की जल्‍दी में नहीं दिख रहे।

काम शुरू करने का भरोसा दे रहे नियाेक्‍ता

बिहार से जो लोग रोज कमाने और खाने की जुगाड़ में देश के किसी शहर में गए हैं, उन्हेंं रोजगार देने वालों ने लॉकडाउन में बेरोजगारी दे दी। रोजी और रोटी की दिक्कत हुई तो वे किसी भी कीमत पर गांव लौटना चाहते हैं। पर, लॉकडाउन के तीसरे चरण में ऐसे कामगार भी हैं, जिन्‍हें उनके नियाेक्‍ता काम शुरू करने का भरोसा व पैसे देकर रोक रहे हैं।

फैक्ट्री वाले भी कामगारों को रोक रहे

दो हफ्ते बाद लॉकडाउन में छूट के संकेत के बाद अब फैक्ट्री वाले भी अपने कर्मचारियों को रोकने में जुट गए हैं। सूरत में पूर्वांचल समिति से जुड़े लवकुश मिश्रा बताते हैं कि शनिवार की रात बिहार-यूपी के लोगों को लेकर करीब दो बसें रवाना हुई थीं, किंतु इसी बीच फैक्ट्री मालिकों को पता चल गया तो बड़ोदरा के पास सारी बसों को रोककर वापस कर दिया गया। माना जा रहा है कि फैक्ट्री मालिकों ने प्रशासन पर दबाव डालकर ऐसा किया होगा, ताकि कामगारों की कमी न पड़ जाए।

शुरू में घर जाने को थे बेताब, अब फायदा नहीं

सूरत में बिहार-यूपी के करीब 14 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न फैक्ट्रियों में काम करते हैं। एक सूत फैक्ट्री में काम करने वाले सर्वेश कुमार ने बताया कि शुरू में घर जाने के लिए बेताब थे, लेकिन अब जाने से फायदा है तो है नहीं। लॉकडाउन अंतिम चरण में है। फैक्ट्रियां खुलने वाली हैं। मालिक ने अगले हफ्ते से काम पर बुलाया है। ऐसे में भीड़ भरी ट्रेन से जाकर खुद को संक्रमित क्यों करूं।

नौकरी सुरक्षित तो परदेस में नाे प्रॉब्‍लम

बाकी जो लोग प्रवास पर विभिन्न शहरों में रहते हैं, और जिन्‍हें कोई आर्थिक संकट नहीं, वे भी बिहार आने को उतने लालायित नहीं। उनकी नौकरी वहां सुरक्षित है। घर-डेरा भी ठीक है। वेतन-भत्ते भी नहीं कट रहे। फिर किसी विशेष ट्रेन पर चढ़कर वे अपने जिले के प्रखंड के क्वारंटाइन कैंप में रहना क्यों पसंद करेंगे? वे लोग अपने प्रवास के क्षेत्र में वहीं जमे हैं। लॉकडाउन में ग्रीन और ऑरेंज जोन में फैक्ट्री-संस्थान खुलने की खबरें भी उन्हेंं रोक रहीं।

ट्रेन में सता रहा संक्रमण का डर

चेन्नई में इनफील्ड लिमिटेड में काम करने वाले अमरेंद्र कुमार बिहार के गया जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दिन अहसास हो गया था कि आगे कुछ होने वाला है। लौटने के लिए ट्रेन-प्लेन में टिकट देखा, लेकिन नहीं मिला। 25 मार्च के बाद तो कोई विकल्प ही नहीं था और अब जाने का कोई मतलब नहीं है। ट्रेन में संक्रमण का खतरा है। पहले चला जाता तो कंपनी का वर्क फ्रॉम होम का फायदा उठा लेता। मां-पिता के साथ रहने का आनंद भी मिलता। किंतु अब हम जैसे इंप्लाई को महंगा ही पड़ेगा। हालात सामान्य होने पर ही विचार किया जा सकता है।

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